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"दुविधा से समाधान तक "

  भावनाओं के कुछ मिश्रणों से जब मैंने ज़िंदगी को परखना चाहा, तो ज़िंदगी ने मुझे एक कटघरे में आकर खड़ा कर दिया।उस कटघरे में मुझे बुद्धि और भावनाओं में से किसी एक का चुनाव कर उसके पक्ष में बोलने का आदेश मिला।पर मैं स्वयं शिकार हूँ इस दुविधा की — कि किसका चुनाव उचित होगा, और किसका पक्ष अधिक भारी।अगर अपने अनुभवों से बताना चाहूँ तो बुद्धि ने मुझे विवेक सिखाया और हृदय ने प्रेम। मेरी यह मान्यता है कि मेरा हृदय ही मेरा परिचय है, किन्तु विवेक का जीवन में न होना मतलब मूर्खता माना जाता है। और सत्य यह है कि कई बार मैं मूर्ख बनी हुई हूँ और इस चीज़ का अनुभव मैंने कई ठोकरों से सीखा है।जिस हृदय को हम अपनी पहचान मानते हैं, अक्सर वही हृदय हमें शिक्षा भी देता है।पर तुलना में बुद्धि का अनुचित स्थान पर उपयोग भी उतना लाभकारी नहीं होता है। इस असमंजस में मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ कि किसको प्राथमिकता देना अधिक उचित होगा। पुष्प जैसा हृदय है और बाण जैसी बुद्धि। युद्ध में बाण आवश्यक है किंतु सम्मान में पुष्प। बाण में संघर्षों की परछाई है और पुष्प में शांति की। किन्तु अंततः संघर्ष हम हृदय की शांति के लिए तो क...