"दुविधा से समाधान तक "
भावनाओं के कुछ मिश्रणों से जब मैंने ज़िंदगी को परखना चाहा, तो ज़िंदगी ने मुझे एक कटघरे में आकर खड़ा कर दिया।उस कटघरे में मुझे बुद्धि और भावनाओं में से किसी एक का चुनाव कर उसके पक्ष में बोलने का आदेश मिला।पर मैं स्वयं शिकार हूँ इस दुविधा की — कि किसका चुनाव उचित होगा, और किसका पक्ष अधिक भारी।अगर अपने अनुभवों से बताना चाहूँ तो बुद्धि ने मुझे विवेक सिखाया और हृदय ने प्रेम।
मेरी यह मान्यता है कि मेरा हृदय ही मेरा परिचय है, किन्तु विवेक का जीवन में न होना मतलब मूर्खता माना जाता है। और सत्य यह है कि कई बार मैं मूर्ख बनी हुई हूँ और इस चीज़ का अनुभव मैंने कई ठोकरों से सीखा है।जिस हृदय को हम अपनी पहचान मानते हैं, अक्सर वही हृदय हमें शिक्षा भी देता है।पर तुलना में बुद्धि का अनुचित स्थान पर उपयोग भी उतना लाभकारी नहीं होता है। इस असमंजस में मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ कि किसको प्राथमिकता देना अधिक उचित होगा।
पुष्प जैसा हृदय है और बाण जैसी बुद्धि।
युद्ध में बाण आवश्यक है किंतु सम्मान में पुष्प।
बाण में संघर्षों की परछाई है और पुष्प में शांति की।
किन्तु अंततः संघर्ष हम हृदय की शांति के लिए तो करते हैं — चाहे वह हमारा क्रोध हो, प्रतिशोध हो या जीवन को सरल करने का प्रयास।अर्थात संघर्ष हम शांति के लिए करते हैं और कई बार शांति संघर्ष के पश्चात ही प्राप्त होती है।
तो उचित कौन है???
इस उपमा के बाद मेरे हृदय का बवंडर कुछ शांत होने लगा, क्योंकि जीवन में किसी एक को प्राथमिकता देने पर भी उचित परिणाम नहीं आएगा।और दोनों को साथ लेकर चलना भी हर किसी के बस की बात नहीं है।
किन्तु कई बार मैंने देखा है कि बुद्धि को प्राथमिकता देने वाले विश्व को जीत जाते हैं,और हृदय को प्राथमिकता देने वाले विश्व में बसे लोगों को जीतते हैं। इसमें आवश्यक भूमिका यह है कि तुम्हारी प्राथमिकता क्या है — विश्व को जीतना या लोगों को?
क्योंकि कोई तुम्हें कहेगा सूर्य बनो, तो कोई कहेगा चंद्र।किन्तु यह सोचना अति आवश्यक है कि इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करना ही क्या उचित माना जाता है?
अगर चंद्र शांति का प्रतीक है, तो सूर्य भी त्याग का है —
जो खुद जलकर भी जग को प्रकाशित करना जानता है।कुछ ऐसे नहीं, जो केवल जलते जाएँ और उसका कोई परिणाम न निकले — जैसे हमारे प्रयास होते हैं, कई बार उन प्रयासों का कोई परिणाम नहीं होता।अंत में बस त्याग जलता हुआ दिखाई देता है।किन्तु उस समय चंद्र की शीतलता से स्वयं को संयम देकर,जलते रहकर, प्रकाश के अंत तक प्रयास करना — यही सूर्य को तेजस्वी बनाता है।चंद्र हमें सपने दिखाता है तो सूर्य सत्य।चंद्र हमें भावनाएँ सिखाता है और सूर्य साहस।
सूर्य के प्रयास में तीव्रता है तो चंद्र के प्रेम में कोमलता।
उसी तरह ज्ञान जीवन को दिशा देता है और प्रेम उसे अर्थ।
कई बार हमें बुद्धि हराती है, तो कई बार हृदय।किंतु हर एक अनुभव लेते हुए आगे बढ़ते रहना — यही जीवन है।
बुद्धि हमें हमारे लक्ष्य तक ले जाती है और उसके लिए शक्ति हमें हृदय से मिलती है।लक्ष्य की ओर दिशा बुद्धि दिखाती है और चलने के लिए प्रेरणा हृदय देता है।हमें लक्ष्य का तर्क तो बुद्धि देती है, किंतु उसको महसूस तो हृदय से किया जाता है।सच बताऊँ तो मैं जितना सोच रही हूँ, उतना ही मेरा दोनों के प्रति सम्मान और आदर बढ़ता जा रहा है।निष्कर्ष निकालना चाहूँ तो मैं यही निकालूँगी कि दोनों को प्राथमिकता देना उचित होगा।
हम अक्सर सोचते हैं कि जब भी दिल की वजह से हारते हैं, तो लगता है दिल की गलती है — काश हमने बुद्धि को चुना होता।और जब हम बुद्धि से चलकर लोगों को खो देते हैं, तो लगता है कि काश हमने दिल से थोड़ा सोचा होता — और हम बुद्धि को दोष देने लग जाते हैं।
किंतु सत्य यह है कि हम दिल से हारते हैं क्योंकि हमने विवेक को ग्रहण नहीं किया होता है। जब बुद्धि की वजह से हारते हैं, तो हम दिल को नज़रअंदाज़ किया हुआ होता हैं।
तो उचित यही है कि दोनों को समान रूप से सम्मान रखते हुए चलना ही हमें संतोष का अनुभव देगा ।
- Devyani Aher Patil ✨
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